कार्यकर्ता

जितनी हल्की धूप सुबह की थी उतनी ही हल्की मुस्कान के साथ मैं पिछले 15-20 दिनों से लगातार अपने बूथ स्तरीय क्षेत्र में घूम रहा था।  मन मे कुछ पार्टी के उद्देश्य और कुछ व्यक्तिगत सामंजस्य के साथ लोगों से मिलता जुलता था। प्रधानमंत्री मोदी जी के कार्यकाल में निर्गत की गई कुछ योजनाओ का ( गैस सब्सिडी , प्रधानमंत्री मुद्रा लोन , उज्ज्वला योजना,व अन्य ) लोग पुरजोर समर्थन और प्रसंशा करते नजर आए तो कुछ ऐसे सवाल लोगों ने दाग दिए कि मैं निरूत्तर हो गया ।
  हालांकि कुछ समस्याएं ऐसी भी थी जिसमें मैं हस्तक्षेप करने व संतुष्ट करने में सक्षम था , पर जिस समस्या का समाधान मेरे समझ से भी परे थे उनकी ओर मैं ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा ।
  वे समस्या मुख्यतः मुद्रा लोन में व्याप्त गड़बड़ी और आरक्षण के विरोध में थी।
मुद्रा लोन:- लोगों का कहना है कि मुद्रा लोन ग्रामीण स्तर पर भी युवाओं को मिलना चाहिये , पर ग्रामीण इलाकों के बैंकों की इसमें कोई रुचि प्रतीत नही होती है , यहाँ तक कि अन्य लोन या काम भी बिना बिचोलियों के निष्पादित नहीं होता और बैंक अधिकारियों के सामने तो ग्रामीण खुद को बिल्कुल ही असहाय समझने को मजबूर हैं, इसमें अत्यंत और शीघ्र सुधार की जरूरत है।
‌आरक्षण का विरोध:- अब क्या कहें इसके बारे में जिन लोगों ने ये समस्या सुनाई ठीक उनकी तरह मैं भी था, आज तक जितनी भी प्रतियोगी परीक्षाएं दी उन सभी मे मुझ से 15 से 25 प्रतिशत तक कम प्राप्तांक लाने वाले दोस्त जो आरक्षण के दायरे में आते थे वो किसी न किसी दर्जे के सरकारी कर्मचारी बन बैठे , जबकि पैतृक सम्पति और आर्थिक स्तिथि के मामले में मैं  एक दो समकक्षों को छोड़ बांकियो से बहुत पीछे था , और आज अच्छी क्षमता के बाबजूद मैं अपने घर की दयनीय आर्थिक स्थिति को सुधार न पाया और बेरोजगार घूम रहा हूँ।
पढ़े लिखे होने के बाद भी हालत के आगे नसीब को कोसने पे मजबूर हूँ ऐसा क्यों, जब न पुराने लोग रहे न पुराने हालात तो पुरानी व्यवस्था क्यों, मुझसे मोटी हैसियत वालों को भी आरक्षण का लाभ क्यों, सरकारी नौकरी में बर्दाश्त के बाहर का ये भेदभाव क्यों ।
  या यूं कहें कि सरकारी नौकरी सिर्फ निचली जातियों के लिए बनी है, या यूं कहें कि सरकार सिर्फ उनके लिए ही बनती है, या यूँ कह दें कि मुझे ऊंची जाति में जन्म ही नहीं लेना चाहिए था ।   आज भी हम गुलामों की भांति जी रहे हैं फर्क सिर्फ अंग्रेजों और मूर्खों ( कम शिक्षित) के बीच का है। जब किसी भी भर्ती के लिए सर्वाधिक दक्षता की जरूरत ही नहीं तो प्रतियोगी परीक्षाओं का महत्व ही नहीं रह जाता है। ऐसे में या तो आरक्षण हटा दिया जाय या प्रतियोगी परीक्षाएं, जिससे कि कम से कम हमारी हींन भावना उभर कर सामने न आये। ये समस्या ऐसी है जो 1एक व्यक्ति को दिखने वाली तीन पीढ़ियों को बर्बाद कर चुकी है।
बस कुछ इन्ही चंद बातों के साथ कामना है कि पर्याप्त लिखित समस्या पर विचार किया जाय ताकि पूर्ण जन कल्याण हो सके।
आपका विश्वास भाजन:-
विकास कुमार सनगही
बूथ विस्तारक कार्यकर्ता भारतीय जनता पार्टी
‌पता:- अमरपुर बिहपुर भागलपुर बिहार

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